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'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्'   

वैदिक दर्शन की पुनर्जन्म की अवधारणा के अनुसार मनुष्य निरन्तर शुभ-अशुभ कर्मों में निरत रहता है। उसे कर्मों का फल अवश्य भोगना है, परंतु एक साथ ही एक ही जन्म में समस्त कर्मों का फल मिलना सम्भव नहीं है, अतः उसे अनेक जन्म धारण करने पड़ते हैं, जिसमें वह अपने किये कर्मों का फल भोगता है।इस प्रकार कर्म भोग के आधार पर कर्मों के तीन भेद होते है ।

1. संचित-

किसी भी प्राणी द्वारा वर्तमान क्षण तक किया समस्त कर्म, चाहे वह इस जन्म का हो अथवा पूर्व जन्मों का, संचित कर्म है। इसका फलविवेचन जन्मकुण्डली में योगायोग विचार से किया जाता है। जैसे राजयोग, दरिद्रयोग आदि।

2. प्रारब्ध-

अनेक जन्म-जन्मान्तरों के संचित कर्मों का  फल एक साथ भोगना संभव नहीं है।अतः संचित कर्मों में से जितने कर्मों के फल को प्राणी पहले भोगना आरम्भ करता है, वह प्रारब्ध या भाग्य कहलाता है। इसका विवेचन ज्योतिष में दशा विचार से होता है।

3. क्रियमाण-

 जो कर्म अभी हो रहा है या किया जा रहा है, इसका विवेचन अष्टकवर्ग के आधार पर गोचर अथवा तात्कालिक ग्रहस्थित्यनुसार किया जाता है।

 इस प्रकार ज्योतिषशास्त्र जन्मकुण्डली की ग्रहस्थिति के आधार पर मनुष्य के द्वारा जन्म-जन्मान्तरों में किये गये शुभाशुभ कर्मों को जातक के शुभाशुभ फल के रूप में प्रकाशित करता है।

इसलिये आचार्य वराहमिहिर का कथन है कि

यदुपचितमन्यजन्मनि शुभाशुभं तस्य कर्मणः पक्तिम् । 
व्यञ्जयति शास्त्रमेतत् तमसि द्रव्याणि दीप इव ॥ (लघुजातक)

यह शास्त्र मनुष्य के लिये उसी प्रकार पथ निर्देशन का कार्य करता है, जैसे गहन अन्धकार में दीपक।

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