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‘ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम्’ ज्योतिष-शास्त्र  की इस व्युत्पत्ति के अनुसार सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिषशास्त्र कहते हैं। काल को आधार बनाकर फल विवेचना के लिये जन्म कालीन ग्रहों की स्थिति के अनुसार कुण्डली का निर्माण किया जाता है। जन्मकुण्डली के द्वादश भावों में स्थित ग्रहों के परस्पर सम्बन्धादि का विचार कर वैयक्तिक फल का विवेचन होरास्कन्ध में किया जाता है  संहितास्कन्ध में शकुन, वास्तु अदि विषय भी आते हैं। ग्रहादि कों के प्रभाव का अध्ययन कर उसके अनुसार शुभा अशुभ फलकथन और मानव जीवन से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं का –अध्ययन कर समुचित मार्गदर्शन देना ज्योतिष-शास्त्र का मुख्य लक्ष्य है।

हमारे ऋषि-महर्षियों एवं पूर्वाचार्यों ने  ज्योतिः पदार्थों की गति-स्थित्यादि के अतिरिक्त आकाश में  घटने वाली ग्रहण जैसी आश्चर्यजनक घटनाओं का भी सतत निरीक्षण करके प्राणियों पर पड़ने वाले शुभा अशुभ प्रभाव का विश्लेषण कर ज्योतिषशास्त्र के मानक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया। उनके द्वारा रचित ज्योतिष-शास्त्र के सिद्धान्त रूपी अनमोल रत्न ज्योतिषशास्त्र की अमूल्य धरोहर हैं। वैदिक दर्शन की अवधारणा पर आधारित ज्योतिष-शास्त्र वेदांग के नेत्र के  रूप में  प्रतिष्ठित है। वेदांग ज्योतिष में सभी वेदांगों में इसकी प्रधानता स्वीकार की गयी है

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