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संसार के सभी दृश्य पदार्थ परिवर्तन शील हैं । इसी परिवर्तन के ज्ञान का जो हेतु है, उसी को काल कहते हैं । यह काल अद्वितीय, सर्वव्यापी तथा नित्य है । भूत, भविष्य एवं वर्तमान – ये काल के व्यावहारिक भेद हैं । काल एक ही है । काल के ही वशीभूत होकर ब्रह्मा सृष्टि रचते हैं, विष्णु पालन करते हैं तथा शिव संहार करते हैं । वर्षा-शीत-ग्रीष्म, प्रातः – सायं, दिन-रात्रि, शिशिर-हेमन्त-वसन्त आदि काल के ही रूप हैं । इसी में समस्त प्राणी जन्मते-मरते हैं । कालानुसार ही वृक्षों में फल-फूल आते हैं, बीजांकुरण भी कालानुसार ही होता है । ‘कालाधीनं जगत्सर्वम्’ । प्राणियों के व्यावहारिक एवं पारमार्थिक सभी कार्य कालाधीन हैं और ‘काल’ ज्योतिष शास्त्र के अधीन है । अतः ज्योतिष शास्त्र लौकिक-पारलौकिक सभी कार्यों के लिये मुहूर्त निर्धारित करता है ।

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