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मनुष्य के जीवन में गृह निर्माण का विशेष महत्त्व होता है, अतः अत्यन्त सावधानी के साथ गृह निर्माण कराना चाहिये।

दिशा-निर्धारण

गृह-निर्माण के लिये दिशा-निर्धारण एवं गृहकर्ता के लिये उसकी अनुकूलता पर विचार करना चाहिये।

वास्तु शास्त्र में राशि एवं वर्ग के अनुसार निषिद्ध दिशा का उल्लेख प्राप्त होता है। वृष, सिंह, मकर और मिथुन राशि वालों को ग्राम के मध्य में, वृश्चिक राशि वालों को दक्षिण में, कर्क राशि वालों को अग्नि कोण में, कन्या राशि वालों को दक्षिण में, कर्क राशि वालों को नैर्ऋत्य कोण में, धन राशि वालों को पश्चिम में, तुला राशि वालों को वायव्य कोण में, मेष राशि वालों को उत्तर में एवं कुम्भ राशि वालों को ईशान कोण में नहीं बसना चाहिये।

अवर्ग पूर्व दिशा में, कवर्ग अग्नि कोण में, चवर्ग दक्षिण में, टवर्ग नैर्ऋत्य में, तवर्ग पश्चिम में पवर्ग वायव्य में, यवर्ग उत्तर में एवं शवर्ग ईशान में बली होते हैं। अपने वर्ग से पाँचवाँ वर्ग शत्रु होता है। अतः अपने से पाँचवें वर्ग में निवास नहीं करना चाहिये। जैसे कि अवर्ग नाम वालों को पश्चिम में आवास नहीं बनाना चाहिये।

मुहूर्तचिन्तामणि के अनुसार

प्रत्येक दिशा का अपना-अपना गरुड़ आदि वर्ग भी होता है। पूर्व दिशा का गरुड़, आग्नेय का मार्जार, दक्षिण का सिंह, नैर्ऋत्य का धान, पश्चिम का सर्प, वायव्य का मूषक, उत्तर का गन एवं ईशान का शशक वर्ग है। इसमें भी अपने से पाँचवाँ वर्ग शत्रु होता है। अकारादि वर्ग एवं गरुड़ आदि वर्ग को इस प्रकार समझा जा सकता हैं।

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