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क्या और कैसे पूजा के बारे में

भारतीय वैदिक संस्कृति के अनुसार यज्ञ को सम्पादन करना ही विभिन्न प्रकार के शास्त्रों का प्रमुख लक्ष्य है। यज्ञ फल के भेद से कई प्रकार के होते हैं, अर्थात् उनके फल भी अलग-अलग होते हैं। इन यज्ञों के विधिवत् सम्पादन हेतु सम्बन्धित देवताओं का आवाह्‍न के बाद पूजा का क्रम रहता हैं। पूजा के बाद हवनीय द्रव्यों के द्वारा आहुति प्रदान की जाती है। यह वैदिक अनुष्ठानों का क्रम रहता है।

वैदिक अनुष्ठानों के अतिरिक्त यदि घर में ही चित्र या मूर्ति का पूजन करना हो अथवा मन्दिर में जाकर पूजा करनी हो तो विभिन्न उपचारा के द्वारा पूजा की जा सकती है। विभिन्न उपचारों में सामान्य रूप से पञ्चोपचार व विशेष रूप से षोड़शोपचार का क्रम कर्मकाण्ड जगत् व पण्डित समुदाय में प्रसिद्ध है।

पञ्चोपचार क्रम -

॥ " गंधं, पुष्पं, धूपं, दीपं, नैवेद्यम् " ॥

गन्ध - सम्बन्धित देवता की प्रतिमा, मूर्ति या चित्रपट को गन्ध (चन्दन, रोली, अष्टगन्ध इत्यादि) से विलेपित करना गन्ध उपचार में आता है।

पुष्प → पूजा के क्रम में पुष्प का विशेष महत्व है। शास्त्रानुसार पुष्प में लक्ष्मी का निवास होता है।

यथा - " पुष्पेषु लक्ष्मीर्वसति " "लक्ष्मीर्वसति पुष्करे"
इसलिए पूजा के क्रम में पुष्प अर्पण व पुष्प के अभाव में अक्षत अर्पण का महत्त्व रहता हैं।

धूप → गन्ध व पुष्प के बाद तृतीय क्रम धूप का हैं, जिसमे सुगन्धित द्रव्यों गुग्गल व घृतादि का अग्नि में त्याग किया जाता है। पर्यावरण की दृष्टि से वातावरण शुद्धि धूप का अन्य प्रयोजन रहता है। धूप देने की परम्परा भारतीय संस्कृति में परम्परागत रूप से पूजन व अर्चन का हिस्सा रही है।

दीप → धूप के आघ्रापन (सूंघाना) के बाद दीपज्योति का दर्शन करवाया जाता है। इस प्रकल्प में शुद्ध गौ-घृत के दीप प्रज्वालन के द्वारा शत्रुबुद्धि के विनाश की कामना की जाती है।

" शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपो देव नमोस्तुते "

नैवेद्य - पञ्चोपचार पूजा के विधान में अन्तिम क्रम नैवेद्य का रहता है, नैवेद्य ही प्रसाद या भोग होता है। श्रद्धापूर्वक प्रसाद अर्पण करने के पश्चात् प्राण-अपान-व्यान-उदान-समान आदि क्रम से आचमन की प्रक्रिया होती है।

षोड़शोपचार पूजा की विधि व क्रम

विधिवत् शास्त्रीय परम्परा से किये जाने वाले अनुष्ठानों में देवताओं की षोड़शोपचार पूजा की जाती है। जिसमें सौलह प्रक्रियाओं, प्रकल्पों या पदार्थों के द्वारा सम्बन्धित देवताओं का पूजन किया जाता है।
षोड़श (१६) उपचारों का क्रम निम्न प्रकार से है -

1. आवाहन - षोड़शोपचार पूजा की विधि में सर्वप्रथम आवाहन किया जाता है। जिसमें वैदिक मंत्रोचार के द्वारा देवता की पूजा के लिए सम्बन्धित मूर्ति या मण्डल में विनय पूर्वक बुलाया जाता है। आवाहन के लिये भिन्न-भिन्न देवताओं के भिन्न-भिन्न प्रकार के मन्त्र होते है।

2. आसनम् - आह्‍वाहित देवता को आसन अर्पित किया जाता है। शास्त्रानुसार आसन, जल व प्रेम-पूर्वक बात करना उत्तम व्यवहार की श्रेणी में आता है।

यथा - "तृणानि भूमिरूदकं वाक् चतुर्थी च सुनृता"

3. पाद्य - आह्‍वाहित देवताओं के लिए आसन समर्पित करने के पश्चात् पादयोर्पाद्यम्" अर्थात् पैर धुलवाए जाते है । यह स्नान की प्रक्रिया का आरम्भिक स्तर है।

4. अर्घ्य - पैर धुलवाने के बाद हाथ धुलवाए जाते है। "हस्तयोरर्घ्यम्" अर्थात् हाथ में अर्घ्य जल समर्पित करना। यह स्नान की प्रक्रिया का अग्रिम चरण है।

5. आचमन→ आचमन का सम्बन्ध अन्तःकरण की शुद्धि से है। हाथ पैर आदि बाह्‍य अंगों के प्रक्षालन के बाद अन्तःकरण को शुद्ध करने हेतु आवाहित देवता के मुख में आचमन करवाया जाता है।

यथा →"मुखे आचमनीयम्"।

6. स्नान - क्रमशः एक-एक करके बाह्य अंगों व अन्त: करण की आचमन के द्वारा शुद्धि के बाद सम्पूर्ण स्नान करवाया जाता है। स्नान की यह प्रक्रिया देवता के समस्त अङ्गों में अर्पित की जाती है। इसलिए कहा है "सर्वाङ्गे स्नानम्" ।

7. वस्त्र - स्नान के बाद शुद्ध व नवीन वस्त्र धारण करवाया जाता है। "लोकलज्जानिवारणार्थं वस्त्रम्" लोक लज्जा का निवारण वस्त्रधारण का प्रयोजन है।

8. यज्ञोपवीत - गणेशादि देवताओं को यज्ञोपवीत (जनेऊ) अर्पित किया जाता है।

9. गन्धाक्षत- चन्दन, रोली, अष्टगन्ध व चावल आदि का लेपन।

10. पुष्प → देवताओं की प्रकृति के अनुसार पुष्पार्पण किया जाता है।

सरस्वती जी को श्वेत पुष्प

लक्ष्मी जी को रक्त कमल

देवी को रक्त पुष्प इत्यादि।

11. धूप - गुग्गल धृतादि हवनीय द्रव्यों के द्वारा देवताओं को धूप अर्पण किया जाता है।

12. दीप - शुद्ध घृत का दीप प्रज्वालन करके देवताओं को दीप दर्शन करवाया जाता हैं व शत्रुनाश के लिए प्रार्थना की जाती हैं।

13. नैवेध - यथाशक्ति व श्रद्धापूर्वक प्रसाद का निवेदन तुलसी पत्र के त्याग के पश्चात घण्टानाद व आचमन करवा कर किया जाता है | नैवेध के साथ ही "ऋतुफलादि" व मुखशुद्धि के लिए " ताम्बूल" का निवेदन किया जाता है।

14. दक्षिणा - उपरोक्त पूजा के साफल्य के लिए द्रव्य दक्षिणा का अर्पण आवश्यक माना जाता है। शास्त्र में दक्षिणा को यज्ञ की पत्नि मानकर उसकी महत्ता बताई गई है।

15. मन्त्र-पुष्पाञ्जलि - अनुष्ठान में जिन-जिन देवताओं का आह्वान व पूजन किया जाता है, उन-उन देवताओं के प्रति पुष्प/अक्षत को मन्त्रोच्चार पूर्वक अर्पण करते हुए यशोवृद्धि व कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

16. प्रदक्षिणा - पूजा क्रम में हुई समस्त त्रुटियों हेतु क्षमा प्रार्थना करते हुए व पूजा को देवता के प्रति समर्पण की भावना से परिक्रमा (घटी क्रम के अनुसार) करते हैं । प्रदक्षिणा षोडशोपचार में अन्तिम उपचार या क्रम है।

पूजा में देवताओं का पूजन क्रम- विधिवत् पूजन के अनुसार दीपक की स्थापना के बाद सर्वप्रथम गणेश पूजन, षोड़शमातृका पूजन, नवग्रह पूजन के बाद वरुण कलश में मुख्य देवता का आह्वान करके षोड़शोपचार द्वारा या पञ्चोपचार द्वारा पूजा की जाती है।

इस प्रकार पूजा विधि व क्रम को समझते हुए शास्त्रीय मतानुसार आचरण करते हुए विभिन्न अनुष्ठानों में पूजा पद्धतियों का सम्पादन करना चाहिए।

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