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ज्योतिष-शास्त्र का  लक्ष्य

'ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम्' ज्योतिष-शास्त्र  की इस व्युत्पत्ति के अनुसार सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिषशास्त्र कहते हैं। काल को आधार बनाकर फल विवेचना के लिये जन्म कालीन ग्रहों की स्थिति के अनुसार कुण्डली का निर्माण किया जाता है। जन्मकुण्डली के द्वादश भावों में स्थित ग्रहों के परस्पर सम्बन्धादि का…

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राहु-केतु की उत्पति

 विष्णु पुराण के अनुसार एक समय देवताओं और दानवों में लंबे समय तक युद्ध चलता रहा। भगवान विष्णु ने दोनों पक्षों से समुद्र मंथन करने के लिए के लिए युद्ध रोकने का आग्रह किया। असुरराज बलि ने देवराज इन्द्र से समझौता कर लिया और समुद्र मंथन के लिये तैयार हो गये। समुद्र मंथन से जो…

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वास्तु पुरुष

जिस भूमि पर मनुष्यादि प्राणी निवास करते हैं, उसे वास्तु कहा जाता है। इस के गृह, देव प्रासाद, ग्राम, नगर,  आदि अनेक भेद हैं।  वास्तु के आविर्भाव के विषय में मत्स्यपुराण में आया है कि अन्धकासुर के वध के समय भगवान् शंकर के ललाट से जो स्वेदबिन्दु गिरे उनसे एक भयंकर आकृति वाला पुरुष प्रकट…

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युगप्रमाण

सत्ययुग- सत्ययुग = 4000 देवतावर्ष।  सत्ययुग की पूर्व सन्ध्या- 400 देवतावर्ष।  सत्ययुग की अन्तिम सन्ध्या- 400 देवतावर्ष।  सत्ययुग- 1440000+144000+144000 =1728000 (सत्रह लाख अट्ठाईस हजार) मानववर्ष। त्रेतायुग-  त्रेतायुग 3000 देवतावर्ष।  त्रेतायुग की पूर्व सन्ध्या- 300 देवतावर्ष।  त्रेतायुग की अन्तिम सन्ध्या 300 देवतावर्ष। त्रेतायुग 1080000+108000+108000 = 1296000 (बारह लाख छियानबे हजार) मानववर्ष। द्वापर- द्वापर युग 2000 देवतावर्ष।…

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मास

सप्ताह सूर्यादि सात वारों के क्रमानुसार एक चक्र पूर्ण होने के काल का नाम सप्ताह है। पक्ष पक्ष दो हैं, कृष्णपक्ष तथा शुक्लपक्ष। ये 15-15 तिथियों के होते हैं। कृष्णपक्ष पितरों का दिन तथा शुक्लपक्ष पितरों की एक रात्रि होती है।चन्द्रकलाओं की वृद्धि से शुक्ल पक्ष तथा हास से कृष्णपक्ष का निर्धारण हुआ। अयन अयन…

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तिथि-देव-पूजा-महत्व

भविष्यपुराण के अनुसार  मूलमन्त्र, नाम-संकीर्तन  मन्त्रों से कमल के मध्य में स्थित तिथियों के स्वामी देवताओं की विविध उपचारों से भक्तिपूर्वक यथाविधि पूजा करनी चाहिये तथा जप-होमादि कार्य करने चाहिये। इनके प्रभाव से मानव लोक में और परलोक में सदा सुखी रहता है। उन-उन देवों के लोकों को प्राप्त करता है और मनुष्य देवता के…

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गंड मूल नक्षत्र

अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल एवं रेवती नामक छह नक्षत्र गंड मूल नक्षत्र कहलाते हैं। यदि जन्म के समय चंद्रमा गंड मूल नक्षत्र में हो तो27 दिनों के पश्चात् जब वहीं नक्षत्र आता है, तब उसकी शांति कराई जाती है। गंडांत योग जहाँ राशि और नक्षत्र दोनों की समाप्ति एक साथ होती है, उसे गंड…

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करण

तिथि के आधे भाग को 'करण' कहते हैं। ये दो होते हैं  पूर्वार्द्ध तथा  उत्तरार्द्ध । एक चन्द्रमास में 30 तिथियाँ और 60 करण होते हैं। चन्द्र और सूर्य के भोगांशों के बीच 6 अंश का अन्तर एक करण है। करण 11 हैं। उनमें पहले 7 करण  'चर' करण तथा अन्तिम 4 करण 'स्थिर' करण…

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