
Decoding the Divine Enigma
अर्थात सूर्यादिग्रह एंवम समय का जो ज्ञान कराए उसे ही ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है
किसी भी जातक (व्यक्ति) के जनम समय पर ग्रह नक्षत्रों की आकाशीय स्तिथि क्या है, इसका ज्ञान उस जातक को जनम पत्रिका (जनम कुंडली) से लगाया जा सकता है
जातक के जीवन में घटित होने वाली आजीवन पर्यन्त घटनाओ का ज्ञान ज्योतिष विज्ञान के द्वारा ही सम्भव है
भारतीय ज्योतिष शास्त्र वेद के छः अंगों में अपनी प्रधानता रखता है, अतः ज्योतिष वेद का अभिन्न अंग है वेदों में ज्योतिष को चक्षु (आँख) की संज्ञा दी गयी है
वेदांग ज्योतिष के प्रारम्भ में इस शास्त्र का प्राधान्य दिखलाते हुए उल्लेख है की:
जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे ज्योतिष का स्थान सबसे उपर है ।
वेदों में नेत्र रूपी ज्योतिष शास्त्र के तीन स्कन्ध बतलाए गए हैं -
सिद्धांत
संहिता
होरा
सिद्धांत:
प्रथम स्कंध सिद्धांत स्कन्ध, ज्योतिष के सिद्धांत स्कंध में त्रुटिकाल से लेकर प्रलय के अंत तक की कालगणना की गयी है
सौरमास, सावनमास, चंद्रमास, नक्षत्रमास आदि मानो का भेद प्रतिपादित किया गया है
ग्रहों की गति का निरूपण, नक्षत्रों की स्थिति, दिक, देश, कालज्ञान का अनन्यतम उपयोगी अंग अक्षज्य, लम्बजय, धुज्य, कुज्य, समशंकु इत्यादि का आनयन रहता है
संहिता:
ज्योतिष शास्त्र में संहिता विभाग फलित ज्योतिष का प्रधान अंग है
द्वितिय स्कंध में मुख्य रूप से गृहप्रवेश, गेहारंभ, मेलापक, भूशोधन, दीक्षाोधन, मांगलिक कार्यों के मुहूर्त, वृष्टि, ग्रहों के उदय अस्त का फल, ग्रहचर का फल एवं ग्रहण फल आदि का वर्ण किया जाता है
होरा:
होरा शब्द की उत्पत्ति अहोरात्र शब्द से हुई है
होरा शास्त्र में जातक की जन्म कुंडली के द्वादश भाव के फल उनमें स्थित ग्रहों की परस्पर शुभ अशुभ दृष्टि का वर्णन विस्तृत रूप से किया जाता है
जातक के सुख दुःख लाभ हानि उन्नति अवनति अनिष्ट भाग्योदय आदि समस्त शुभ अशुभ का वर्णन इस शास्त्र में रहता है